Saturday, 23 March 2013

क्यूँ सजदा करूँ

मैं क्यूँ सजदा करूँ उस खुदा का
जो मुझे नज़र आता नहीं
मैं तो सजदा करूँ मेरे सनम का
जिसके सदके खुदा से रूबरू होता हूँ

जब दर्द होता है तो मरहम लगाती है
जब ख़ुशी होती है मेरे संग मुस्काती है
जब आँख बंद करूँ मेरा ख्वाब सजाती है
जब आँख खोलूं सामने नज़र आती है

क्यूँ अदा करूँ फूल खुदा को
जब कद्र नहीं उसे खुशबू की
वो मुझे मेरे खुशबू से पहचान जाती है
जब मैं उसके करीब से गुजरता हूँ

जब नींद न आये यादों की लोड़ी बन जाती है
जब नींद आये तो यादो के फूलों से गुदगुदाती है
जब भूल जाऊं रास्ता, मंजिल की राह दिखाती है
जब मिल जाए मंजिल, नया लक्ष्य बताती है

क्यूँ पढूं गीता, कुरान और बाईबल
जब इनके अर्थ समझ आते नहीं
मैं तो पढता हूँ सनम के चेहरे को
जिसपर लिखी हर इबारत समझ लेता हूँ


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राजीव रोशन
१६/०१/२०१३

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